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Amitabh Bachchan Birthday Special By Bhawana Somaaya | नव रसों से भी कहीं ऊपर हैं अमिताभ बच्चन, लेकिन समीक्षकों की बदौलत एंग्री यंग मैन के रूप में ही होती रही पहचान


2 दिन पहले

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पांच दशक के फिल्मी कॅरिअर और अलग-अलग प्रकार की करीब 235 फिल्मों में काम करने के बाद भी अमिताभ बच्चन की पहचान ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में ही होती रही है। इस पहचान के लिए फिल्म समीक्षकों को जिम्मेदार माना जा सकता है। विविध और भांति-भांति की भूमिकाएं करने के बावजूद उन्हें इसका श्रेय नहीं दिया गया।

इसीलिए एक वक्त उन्होंने कहा भी था कि उनके समालोचक अगर यही सोचते हैं कि वे केवल एंग्री यंग मैन की भूमिकाएं ही कर सकते हैं तो ‘एंग्री मिडिल एज्ड मैन’ और बाद में ‘एंग्री ओल्ड मैन’ की भूमिकाएं करते रहेंगे। उनके अंतरमन की गहराई से निकला था यह निराशा का भाव। लेकिन आज पचास साल बाद देखें तो उनके तमाम आलोचक परिदृश्य से गायब हैं और इसके विपरीत अमिताभ बच्चन एक महान घटना के रूप में हमारे सामने नजर आते हैं।

मैं जब अमिताभ पर मेरी लिखी पुस्तक ‘बच्चनलिआ’ के 300 पन्नों को अपने दिमाग में पलटती हूं और ‘सात हिंदुस्तानी’ (1969) से लेकर ‘द लास्ट लियर’ (2009) के फिल्म पोस्टरों से गुजरती हूं तो उनके अप्रतिम फिल्मी कॅरिअर और उससे भी ज्यादा उनके दृढ़ निश्चय को देखकर आश्चर्यचकित रह जाती हूं। आलोचकों की आलोचनाओं से अपने मनोबल को नीचे न गिरने देने के बजाय वे अपनी राह पर सतत आगे बढ़ते रहे।

एक पूर्ण कलाकार वही है जो सभी नौ रसों को अपने अभिनय में प्रस्तुत कर सकें। और अमिताभ का पूरा फिल्मी कॅरिअर इस बात का प्रमाण है कि उनके अभिनय में सभी नौ रस अपनी पूरी रंगत और महक के साथ उपस्थित हुए हैं।

शृंगार रस के बिना भारतीय संस्कृति और सिनेमा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। रोमांस पर अमिताभ की दो फिल्में खास तौर पर याद आती हैं। एक, ‘कभी-कभी’ और दूसरी, ‘सिलसिला’।

‘कभी-कभी’ में प्रेमी-प्रेमिका आपसी रजामंदी से अलग हो जाते हैं। शशि कपूर के साथ राखी तो खुशहाल शादीशुदा जिंदगी बिताती है, लेकिन वहीं दूसरी ओर वहीदा रहमान के रूप में एक अच्छी पत्नी मिलने के बावजूद अमिताभ की शादीशुदा जिंदगी काफी मुश्किलों भरी रहती है। ‘सिलसिला’ में हालात प्रेम करने वालों को जुदा कर देते हैं। फिर कुछ वक्त के लिए दोनों साथ आते हैं, लेकिन थोड़े ही समय बाद दोनों के सपने फिर टूट जाते हैं। दोनों ही फिल्मों में दिल को छूने वाले कई जादुई पल थे।

‘आनंद' मूवी के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन। इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला था।

‘आनंद’ मूवी के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन। इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला था।

अमिताभ की फिल्मों में हास्य रस के तो ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे, क्योंकि हंसना-हंसाना उनकी शख्सियत का जीवंत भाग था। हास्य रस पर उनकी चार फिल्में उल्लेखनीय हैं। ‘अमर अकबर एंथोनी’ में शराब के नशे में किया गया सीन भला कौन भूल सकता है। ‘मिस्टर नटवरलाल’ में भैया-भाभी के साथ हंसी- ठिठोली के दृश्य तो ‘चुपके चुपके’ तथा ‘दो और दो पांच’ में थीम आधारित कॉमेडी।

‘तूफान’, ‘जादूगर’, ‘गॉड तुसी ग्रेट हो’ और यहां तक कि ‘102 नॉट आउट’ में एक बुजुर्ग के अभिनय में अद्भुत रस को देखा और महसूस किया जा सकता है। उनकी हर भूमिका में वीर रस तो होता ही था, क्योंकि वे खलनायक की पिटाई करते और गरीबों-असहायों को न्याय दिलाते। ‘सात हिंदुस्तानी’ में वे देश के लिए अद्भुत वीरता का परिचय देते हैं तो ‘शोले’ में ग्रामीणों व ‘शान’ में परिवार के लिए लड़ते दिखाए गए हैं।

शांत रस को तब तक परदे पर फिल्माया नहीं जा सकता, जब तक कि चरित्र संयमित न हों। अमिताभ के अधिकांश लेखकों ने उन्हें मजबूत और मौन हीरो के रूप में तो दर्शाया, लेकिन शांत हीरो के रूप में नहीं। जिन फिल्मों में उन्हें शांत हीरो के रूप में दर्शाया गया, उनमें से कुछ प्रमुख फिल्में हैं – आलाप, बेमिसाल और मोहब्बतें।

करुण रस की बात करें तो अमिताभ के कई चरित्रों में पीड़ा बार-बार उभरकर सामने आती है। ‘अभिमान’ में वे पत्नी को लेकर दुखी रहते हैं। ‘मिली’ में वे अतीत से परेशान रहते हैं। ‘शराबी’ और ‘सूर्यवंशम’ में वे सख्त मिजाज वाले पिता की छत्र साया से बाहर नहीं आ पाते तो ‘बागबान’ में बच्चों की उपेक्षा का दंश झेलते हैं।

वह अभिनेता जिसकी पहचान ही आक्रोश रही है, के लिए रौद्र रस के विस्तार में जाने की कोई जरूरत नहीं है। हालांकि उनकी ये भूमिकाएं इस मायने में खास रही हैं कि उन्होंने इस रौद्र रस को भी हर बार अलग-अलग तरीके से अभिव्यक्त किया। ‘जंजीर’ में वे अपने गुस्से में इमोशन्स को मिश्रित करने में सफल रहे तो ‘नमक हराम’ में उनके अहम की वजह से गुस्सा अभिव्यक्त होता है। ‘अग्निपथ’ में नफ़रत उनके गुस्से की वजह बनती है।

भयानक रस का सबसे अच्छा उदाहरण ‘कालिया’ में डरपोक कल्लू का कालिया के रूप में रूपांतरण है जो अपने परिवार पर अत्याचार करने वालों से लड़ता है। ‘बेनाम’ में अमिताभ को सिस्टम धमकाता है तो वे उसे ही खत्म करने के लिए उसके खिलाफ उठ खड़े होते हैं।

और अंत में वीभत्स रस की बात करते हैं तो फिल्म ‘दीवार’ इसकी बढ़िया मिसाल है। इसमें पिता व समाज के प्रति घृणा इस हद तक पहुंच जाती है कि वे अपराधों की तरफ झुक जाते हैं। ‘दो अनजाने’ में वे अपनी पत्नी और अपने दोस्त के प्रति घृणा का भाव रखते हैं और उन्हें प्रताड़ित करते हैं।

अमिताभ द्वारा निभाई गईं कई भूमिकाओं का उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन समस्या यह है कि उनके लिए कोई रस ही नहीं है। उदाहरण के लिए, त्रिशुल, जुर्माना, शक्ति…। इस सूची का कोई अंत नहीं है।

(लेखिका जानी-मानी समीक्षक और इतिहासकार हैं।)



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