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Jagjit Singh Death Anniversary: डेढ़ दिन की दोस्ती का वो किस्सा और जगजीत सिंह | – News in Hindi


गज़ल गायकी की दुनिया के बादशाह कहे जाने वाले जगजीत सिंह (Jagjit Singh) पर बात शुरू करने से पहले उनकी तीन शेषताओं का जिक्र. जादू जगाने वाली ‘आवाज़’, गज़लों के चयन में कमाल और बेमिसाल कम्‍पोज़ीशन. गायकी में एक तरह की ईमानदारी और बेबाकी, जो उनकी जि़ंदगी में भी प्रस्‍फुटित होती रही. मीडिया विस्‍फोट के इस दौर में उनकी जीवनगाथा और गज़ल यात्रा से जुड़ा सब कुछ सर्वत्र उपलब्‍ध है. सो यहां कुछ अलग तरह की बातें. शरूआत एक किस्से से. बात पुरानी है मैं उन दिनों एक बड़े अखबार में कला समीक्षक हुआ करता था. जगजीत का फैन था. शहर में जगजीत का कॉन्‍सर्ट था. जिस शाम आयोजन था उस सुबह अखबार में जगजीत को लेकर मेरा एक आर्टिकल प्रमुखता से छपा.

आयोजकों से बात की और जगजीत जी से इंटरव्‍यू के लिए समय मांगा. आयोजकों ने मेरा निवेदन सीधे सीधे रिजेक्‍ट कर दिया और कहा, जगजीत जी प्रेस से ना तो व्‍यक्तिगत रूप से मिलेंगे और न ही ग्रूप में. कवरेज के लिए आना हो तो ? सीधा सपाट जवाब – ‘टिकिट लेकर आ जाईए.‘ टिकिट शायद 500 रूपए का था. सुनने जाने का मन तो था लेकिन कवरेज के लिए जाओ तो पूरा प्रोग्राम तो सुन नहीं सकते, बीच में ही भागना पड़ता है सो तय किया कि कन्‍सर्ट में नहीं जाया जाए.

शाम को अखबार के दफ्तर पहुंचा और न्‍यूज एडीटर को बताया कि भारत भवन जा रहा हूं, कवरेज के लिए. उन्‍होंने आश्‍चर्य से कहा, क्‍यों जगजीत का कार्यक्रम कवरेज नहीं करोगे. मैंने कहा कि टि‍किट अरेंज करवा दें तो चला जाउंगा. आयोजकों ने प्रेस को कवरेज के लिए नहीं बुलाया है. उन्‍होंने मुझे कुछ देर रूकने को कहा. कुछ फोन घुमाए और आदेश मिला, जगजीत के प्रोग्राम का कवरेज होना है, टिकिट गेट पर मिल जाएगा.

आयोजन स्‍थल पर मुझे रिसीव किया गया और पहली रो में डॉ. बशीर बद्र के बगल में बैठा दिया गया. डाक्‍टर साहब से मेरा अच्‍छा खासा परिचय था. तय था आज भरपूर आनंद मिलने वाला है. जगजीत सिंह, बशीर बद्र की गज़लें बहुत गाते हैं. स्‍टेज पर नामचीन गायक जिस शायर की गज़ल गा रहा हो, उसके बगल में बैठकर सुनने का मज़ा ही कुछ और होता है.

आयोजन शुरू हुआ. जगजीत अपनी टीम के साथ मंच पर अवतरित हुए. शुरू में उन्‍होंने संगतकारों का परिचय कराया फिर उनके साथ सुरों का सामंजस्‍य बैठाया. पहले एक-दो हल्‍के मूड की गज़ल सुनाईं और बीस मिनिट के ब्रेक की घोषणा कर दी. बशीर बद्र बोले, ‘चलो जगजीत से मिलते हैं.‘ मैंने कहा ‘यहां, इस समय ? ‘ ‘संभव होगा?’ वो बोले, ‘आओ तो सही.‘ हम स्‍टेज पर पीछे पहुंचे. जगजीत जी ने वहां महफिल सजाई हुई थी. मेकडेवल नंबर वन की बॉटल खुली हुई थी. बशीर बद्र साहब मेरे बहुत बड़े वेलविशर हैं, सो उन्‍होंने जगजीत सिंह से मिलाते समय मेरी तारीफ कुछ ज्‍यादा ही कर दी, हैसियत से ज्‍यादा. सोने पर सुहागा यह कि जगजीत ने उन पर छपी मेरी स्‍टोरी पढ़ ली थी. वो मुझसे बड़ी आत्‍मीयता से मिले, सौजन्‍यतावश लेख में छपी अपनी तारीफ के लिए शुक्रिया कहा. इंटरव्‍यु की बात निकली तो मैंने बताया कि इंटरव्‍यु के लिए तो आयोजकों ने मना कर दिया है. वो चौंके और कहा कि मुझसे तो किसी ने पूछा नहीं.

नाराज़ होकर उन्‍होंने आयोजक को बुलाया और उनसे कहा कि आपने मुझसे पूछे बिना इंटरव्‍यू के लिए मना क्‍यों किया? फिर मुझसे बोले अभी लोगे इंटरव्‍यू? अंधा क्‍या चाहे दो आंखें. मैंने बशीर बद्र साहब की तरफ आभार जताती नज़रों से देखा, वहां से मुस्‍कुराहट के रूप में ग्रीन सिग्नल था. मैं सीधे सवालों पर आ गया. इस बात को पूरे भरोसे से तो नहीं कह सकता लेकिन मुझे लगता है स्‍टेज के पीछे, कार्यक्रम के दौरान ब्रेक में जगजीत का यह इकलौता साक्षात्‍कार होगा. शुरूआती सवालों के बाद मेरे एक सवाल पर जगजीत सीधे सीधे उखड़ गए. बोले ‘ये शरारती सवाल है.‘
सवाल था – ‘जब कहीं जगजीत की गज़ल बजना शुरू होती है तो सुनने वाले को अंदाज़ लग जाता है कि अब हमें जगजीत सिंह की आवाज़ सुनाई देगी. ये आपकी गायकी की ‘खूबी’ है या ‘खामी’?जगजीत जी को ‘खामी’ शब्‍द से ऐतराज़ था. उनकी भावना की कद्र करते हुए मैंने उनसे सॉरी बोला और जवाब देने का आग्रह किया. बड़प्‍पन दिखाते हुए उन्‍होंने जवाब दिया, बहुत माकूल जवाब दिया – ‘ऐसा हर बड़े संगीतकार के साथ होता है, आप नौशाद के संगीतबद्ध किए गाने सुनें तो शुरूआत में ही पता चल जाता है कि आने वाला गीत नौशाद ने कंपोज़ किया है. यह संगीतकार की पहचान होती है, ये उसकी सिगनेचर ट्यून की तरह है.‘ इससे कोई भी इंकार नहीं करेगा कि जगजीत की गज़लों ने लोकप्रियता की जो ऊंचाईयां प्राप्‍त कीं उसमें उनकी मौसिकी का खासा योगदान है.

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जगजीत सिंह

इस बारे में उनके वीआईपी फैन गुलज़ार क्‍या कहते है, गौर फरमाईए –
‘ एक बात, जो मैं वाज़े करना चाहता हूं, लोगों के लिए, के वो बला के कम्‍पोज़र हैं….. वो कम्‍पोज़र बहुत अच्‍छा है. वही गज़लें और बहुत से लोगों ने गाई हैं, और बहुत तरह से गाई हैं, लेकिन वो जो अपनी गज़ल को वो, थापी दे दे कर या तबले पर उसे सेट करता है, उस वक्‍त देखने की चीज़ है कि, ये कितने ताल में उसको तबदील करता है, कितनी दफा उसकी पौशाक बदलता है, गज़ल की.

ये वही लोग जानते हैं जो कम्‍पोज़ करते हुए उसके साथ बैठे हैं. और ये वर्सटालिटी जगजीत की बहुत बड़ी है, बहुत कमाल की है. खासकर मिर्जा़ ग़ालिब में जगजीत के साथ काम करने आया था, उस दौरान मैं जानता हूं कि गज़ल किस तरह उसके पास आकर करवट लिया करती थी. कई तरह से उसकी रेंडरिंग करते थे और हर बार यही जी चाहता था, यही रेंडरिंग रख ली जाए. लेकिन क्‍योंकि उसके पास एक सिचुएशन थी, एक खास कहानी रेंडर हो रही थी गा़लिब की, तो उसका चुनाव वो खुद करता था, जो बड़ा खूबसूरत होता था. मैं कहूं कि गा़लिब में दो लोग है जिनका सबसे बड़ा कांट्रीब्‍युशन है गा़लिब बनाने में, गा़लिब के इलावा, एक जगजीत हैं और एक नसीरूद्दीन शाह.‘ एक शख्‍स और थे जिनका नाम गुलज़ार ने नहीं लिया और जो दूरदर्शन के सीरियल मिर्जा ग़ालिब के शिल्‍पकार थे – वो थे खुद गुलज़ार.

यहां जगजीत का गाया हुआ, ग़ालिब का एक शेर तो बनता है –
मत पूछ के क्‍या हाल है, मेरा तेरी पीछे
तू देख के क्‍या रंग, तेरा मेरे आगे

तो ये इश्‍यु सेटल हुआ कि जगजीत कमाल के कम्‍पोज़र थे, यहां सवाल बनता है कि उनकी गायकी श्रेष्‍ठ थी कि मौसिकी. इस बारे में बेबाक और सच्‍ची वक्‍ता और उनकी अर्द्धांगनी चित्रा सिंह की राय जानते हैं. जो जगजीत का आकलन ईमानदारी से करने के लिए जानी जाती हैं. सनद रहे ‘आवाज़’ के चलते पहली बार उन्‍होंने जगजीत के साथ गाने इंकार कर दिया था. कहती हैं – ‘उनके कम्‍पोजी़शन की तो मैं शुरू से मुरीद रही हूं, मानती थी कि ये एक मार्बलस कम्‍पोज़र है. धीरे धीरे उनकी वाईस ग्रो हुई. आज भी मैं मानती हूं कि ‘ही इज़ बेटर कम्‍पोजीटर देन ए सिंगर, बट अगेन….’ मैं अपने शब्‍दों पर वापिस आती हूं और कहना चाहती हूँ कि आज वो जिस तरह से गा रहे हैं वो सचमुच कमाल है.’

वापस अपने इंटरव्‍यु वाले किस्‍से पर आते हैं.
बेहद खुशनुमा माहौल में साक्षात्‍कार खत्‍म होने के बाद मैंने उनसे आग्रह किया कि प्‍लीज़ आपकी दो चार गज़लें बता दें जो आप कॉन्सर्ट की शुरूआत में पेश करेंगे. उन्‍होंने नकली गुस्‍से से भरी तिरछी नज़रों से मुझे देखा और कहा ‘दिस इज नॉट फेयर’ मैंने कहा ‘सर, प्‍लीज़ रात के दस बज चुके हैं, प्रेस पहुंचना है. इंटरव्‍यू है और कवरेज की रिपोर्टिंग है, दो-दो राइट अप लिखने हैं. 11.45 बजे तक मुझे दोनों स्‍टोरी सबमिट करनी है. एक दो गज़ल सुनकर निकल जाउंगा, काम तो उनसे भी चल जाएगा, लेकिन आप बता देते तो स्‍टोरी और रिच हो जाती. वैसे मैं आपका कॉन्सर्ट बीच में छोड़कर जाना ही नहीं चाहता, पर क्‍या करें समय के मामले में अखबार की दुनिया के बड़ी निष्‍ठुर है.

अद्भुत बड़प्‍पन दिखाते हुए उन्‍होंने ना सिर्फ मुझे शुरूआत में गाने वालीं गज़लें बताईं, बल्कि उन्‍हें उसी क्रम से पेश भी किया. इतनी बड़ी हस्‍ती का इतना बड़ा सहयोग कभी ना भूलने वाली घटना है, अभी तक मैं उनका फैन था, इसके बाद मुरीद हो गया. उन्‍होंने साबित किया कि वो कितने सहज, कितने दिलदार हैं. लेकिन इसके लिए मेरा सिर्फ जगजीत सिंह का आभारी होना डॉ. बशीर बद्र के साथ कृतघ्‍नता होगी. उनके कारण ही जगजीत सिंह ने मुझे इतना सम्‍मान दिया. बशीर बद्र साहब का स्‍वास्‍थ्‍य इन दिनों बहुत खराब है. भगवान उन्‍हें जल्‍द सेहतयाब करे.

किस्‍से के क्‍लाईमेक्‍स के पहले कुछ गज़ल की बातें.
मौसिकी और गायकी पर बात हो गई. अब आते हैं उनकी गज़लों के लिरिक्‍स पर.
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है (निदा फाज़ली)
जगजीत ने निदा को बहुत गाया है. इस बारे में निदा कहते हैं ‘मेरी गज़ल और जगजीत सिंह की आवाज़ का रिश्‍ता बहुत पुराना है ये उन दिनों की बात है कि जब ग़ालिब जवान होते थे.‘ निदा सादी ज़बान में बहुत गहरी बात कहते हैं और जगजीत इसे सहज रवानगी देते हैं.

‘दुनिया…’ ये लाइनें इतनी आसान हैं कि एक सामान्‍य आदमी को तो समझ में आती ही हैं. साथ ही इनमें इतनी बड़ी और गहरी फिलासफी है कि साहित्‍य के पुरोधाओं को भी अपनी तरफ आक‍र्षि‍त करती है. ऐसा लिखना आसान नहीं होता. निदा की शायरी बेमिशाल है तो इसके चयन के मामले में जगजीत का टेस्‍ट भी कमाल है. यही तो उन्‍हें लोगों के दिलों पे राज करने वाला हरदिल अज़ीज गज़ल गायक बनाता है. सुरर्शन फाकिर, कतील शिफाई उनके शुरूआती शायर थे. बाद में बशीर बद्र, जावेद अख्‍तर और गुलज़ार उनके पसंदीदा शायर बने. फिल्‍म ‘प्रेमगीत’ और ‘अर्थ’ में सहित अनेक फिल्‍मों में उन्‍होंने म्‍युजिक भी दिया है. ‘होंठों से छू लो तुम, मेरे गीत अमर कर दो’ (प्रेमगीत) और ‘तुम इतना जो मुस्‍कुरा रहे हो क्‍या ग़म है जिसको छिपा रहे हो’ (अर्थ) कौन भूल सकता है.

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जगजीत सिंह ने 10 अक्टूबर 2011 को दुनिया को अलविदा कह दिया था.

किस्‍से के क्‍लाईमेक्‍स पर आते हैं. कन्‍सर्ट के दूसरे दिन शनिवार था. मैं अखबार में कला समीक्षक के साथ साथ बैंक में नौकरी भी करता था, वो यूं संभव था, क्‍योंकि कला संबंधी प्रोग्राम शाम या रात को होते थे. बैंकर्स अमूमन शनिवार की छुट्टी बहुत कम लेते थे क्‍योंकि उन दिनों शनिवार हाफ डे हुआ करता था. दस बजे होंगे. मैं तैयार होकर घर से निकल ही रहा था कि मोबाईल की घंटी बजी. अननोन नंबर था. पूछा कौन ? जवाब अप्रत्‍याशित था.
‘मैं जगजीत बोल रहा हूँ’
मैंने अभिवादन किया और कहा ‘कहिए सर’
वो बोले ‘ क्‍या कर रहे हो ? ‘
बैंक के बारे में उन्‍हें नहीं पता था. मैं बोला ‘कुछ नहीं सर, काम से जा रहा हूं.‘
अपनेपन और पूरे अधिकार से वो बोले ‘ कहीं नहीं जा रहे हो, होटल आ जाओ, अभी’
मैंने कहा ‘ सर….’
मेरी बात काट कर बोले – ‘कुछ नहीं, आ जाओ बस’ और फोन काट दिया. इस बीच मैं खुशी खुशी मूड बना चुका था गोली मारो ऑफिस को. शहर के एकमात्र फाइव स्‍टार होटल में उनका डेरा था.

कमरे पर पहुंचा तो वहां अंग्रेजी के एक बड़े राष्‍ट्रीय अखबार की परिचित रिपोर्टर मौजूद थीं. दोनों को उन्‍होंने लंबा इंटरव्‍यू दिया. फिर उन्‍होंने रिपोर्टर मोहतरमा को तो रवाना किया और मुझे रूकने का इशारा किया. उसके जाते ही उन्‍होंने बीयर की बॉटलें खोल लीं. उनके एक साथी भी वहां मौजूद थे. जगजीत जी ने मुझसे कहा अ‍ब यहां तुम्‍हारी मौजूदगी एक पत्रकार के नाते नहीं है. दोस्‍त के नाते है. इसलिए जो भी बात होंगी ऑफ द रिकार्ड होगी और यहां से बाहर नहीं जाएगी. मैंने आज तक उसे निभाया है. ये किस्‍सा भी पहली बार लिख रहा हूं. बहरहाल, हमारी ढेर सारी बातें हुईं. कला-संगीत और साहित्‍य की भी, और दुनियादारी की भी. डेढ़ कब बज गए पता नहीं चला. इस दौरान एक दो बार आयोजक अंदर आए, लेकिन जगजीत जी ने उनको चलता कर दिया.

बाद में बैरे ने मुझसे धीरे से बाहर आने को कहा. मैं बाहर गया तो आयोजकों में से एक सज्‍जन खड़े थे. कहने लगे, ‘सर यहां हमने हमारी संस्‍था के लोगों को सपरिवार बुलाया है, जगजीत सिंह जी के साथ लंच के लिए. सब डेढ़-दो घंटे से इंतज़ार कर रहे हैं. जगजीतजी से तो नहीं बोल सकते, आप चाहें तो पार्टी खत्‍म हो सकती है, प्‍लीज़.‘ मैंने अंदर जाते ही कहा ‘सर अब मैं चलूं.‘ मैं भूल गया कि कितने शार्प आदमी से बात कर रहा हूं, वो तत्‍काल भांप गए, बोले ‘तुम बाहर क्‍यों गए थे? और किसने कहा है तुम्‍हें जाने के लिए?’ मैंने उनसे कहा ‘मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा, मैं फोन करने बाहर गया था.’ वो साफ साफ तो नहीं बोले, लेकिन उनके चेहरे पर अविश्‍वास के भाव थे. मीटिंग तत्‍काल खत्‍म करने को वो तैयार नहीं हुए. मैं समझ रहा था हमारी डेढ़ दिन पुरानी दोस्‍ती को वो किस तरह निभा रहे हैं. दरअसल वो मुझे, उनसे ना मिलने देने वालों के प्रति अपना इन्‍डायरेक्‍ट गुस्‍सा ज़ाहिर कर रहे थे. मेरा दिल उनके प्रति आदर से भर गया. बीस-पच्‍चीस मिनिट बाद हमारी मीटिंग को जैसे तैसे विराम लगा.

तो ऐसे दिलदार थे. जगजीत सिंह सोचिए थोड़े से वक्‍त, कुल जमा डेढ़ दिन के साथ वाले के लिए वो इतना सोच सकते हैं तो अपने साथियों और दोस्‍तों के लिए कितना कुछ करते होंगे. उनकी दरियादिली के किस्‍से यूं ही मशहूर नहीं हैं. जाते जाते एक दिलयस्‍प जानकारी. वो रेसकोर्स के रसिया थे. घोडे़ पालते थे, ये तो सब जानते हैं. लेकिन ये कम लोग जानते होंगे कि अपने अनेक एलबम के नाम उन्‍होंने अपनी घोडि़यों के नाम पर रखे थे. दो तो मैं बताता हूं – डिफरेंट स्‍ट्रोक और ब्‍लेक मैजिक. बाकी आप ढूंढिए. उनकी पुण्‍यतिथि के मौके पर दुश्‍मन फिल्‍म के उनके द्वारा गाए गाने की लाईनें याद आती हैं – चिट्ठी ना कोई संदेश, जाने वो कौन देश, जहां तुम चले गए.





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